दुर्लभ और एक तरह से लुप्तप्राय प्रजाति बन गई है ईमानदारी! इलाहाबाद हाई कोर्ट


उत्तर प्रदेश के विकास प्राधिकरणों में बड़े पैमाने पर व्याप्त भ्रष्टाचार को गंभीरता से लेते हुए इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने टिप्पणी की है, “ईमानदारी दुर्लभ और एक तरह से लुप्तप्राय प्रजाति बन गई है। हमें एक ऐसी योजना तैयार करने के लिए तत्काल कदम उठाने की जरूरत है जिससे ईमानदार और निष्ठावान व्यक्तियों को संरक्षण मिल सके।’’ न्यायमूर्ति सुधीर अग्रवाल और न्यायमूर्ति अजित कुमार की पीठ ने मेरठ के नरेंद्र कुमार त्यागी द्वारा दायर याचिका स्वीकार करते हुए यह टिप्पणी की। याचिकाकर्ता ने मेरठ के कंकड़खेड़ा में डिफेंस एनक्लेव योजना में 200 वर्ग मीटर के प्लाट नंबर बी-399 के आबंटन को चुनौती दी है। यह प्लाट मेरठ विकास प्राधिकरण द्वारा मेरठ के एक निवासी को आबंटित किया गया था।

याचिकाकर्ता के वकील ने दलील दी कि प्रतिवादी की पेशकश को जिसे यह भूखंड आबंटित किया गया था, मेरठ विकास प्राधिकरण के वाईस चेयरमैन द्वारा 22 जुलाई, 2014 को स्वीकार किया गया, जबकि इसकी नीलामी अगले ही दिन यानी 23 जुलाई, 2014 को की गई और नीलामी टीम द्वारा रिपोर्ट बाद में जमा की गई, जिससे पता चलता है कि पूरी प्रक्रिया महज आंख में धूल झोंकने वाली थी।

इस पर पीठ ने टिप्पणी की, “मौजूदा मामले में भूखंड के आबंटन से जुड़े रिकॉर्ड्स से स्पष्ट है कि मेरठ विकास प्राधिकरण के अधिकारी द्वारा अपनाई गई संपूर्ण प्रक्रिया कुछ और नहीं बल्कि जोड़तोड़, फर्जीवाड़ा और मिथ्या प्रस्तुति का पुलिंदा है।” पीठ ने कहा, “भ्रष्टाचार में शामिल लोग अब दैनिक जीवन का हिस्सा हैं और इन लोगों से समाज बहुत व्यापक स्तर पर घिर गया है। आज एक ईमानदार व्यक्ति खोजना बहुत दुर्लभ काम है। बेईमानी और भ्रष्टाचार आम बात हो गई है।”

पीठ ने आगे अपनी टिप्पणी में कहा, “यह सही है कि ईमानदार लोगों की संख्या घट रही है, इसके बावजूद हमारा मानना है कि समाज में पर्याप्त संख्या में ईमानदार लोग हैं। जरूरत इस बात की है कि ऐसे लोगों की पहचान की जाए और इन्हें प्रोत्साहित किया जाए ताकि इनकी संख्या बढ़ सके।” “इस उद्देश्य के लिए भ्रष्ट और बेईमान लोगों को ढूंढ कर उनके खिलाफ एक साथ निवारक कार्रवाई की जाए और उन्हें सख्त सजा दी जाए। भ्रष्टाचार का रोग तेजी से फैल रहा है और इसके इलाज के लिए दर्दनाक प्रयास की जरूरत है।”

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