शिवरात्रि की रात को सीधी रखी जाती है रीढ़ की हड्डी, जानिए वजह…


Maha Shivratri 2018: फाल्गुन माह की कृष्ण पक्षीय चतुदर्शी के दिन महाशिवरात्रि का पर्व मनाया जाता है। इस दिन के लिए अनेकों मान्यताएं प्रचलित हैं, भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए कई भक्त भांग तो कोई जल-दूध और बेलपत्र अर्पित करते हैं। शिवरात्रि की रात के लिए भी पुराणों और ज्योतिष मान्यता रखते हैं कि ये भगवान शिव की सबसे प्रिय रात होती है और इस रात को जागरण करने वाले को विशेष साधनाएं प्राप्त होती हैं। स्कंदपुराण के अनुसार शिवरात्रि वह रात्रि है जिसका शिवतत्व से घनिष्ठ संबंध होता है। भगवान शिव की अतिप्रिय रात्रि को ही शिव रात्रि या काल रात्रि कहा जाता है। शिव पुराण के ईशान संहिता में फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी की रात्रि में आदिदेव भगवान शिव करोड़ों सूर्य के समान प्रभाव वाले लिंग के रुप में प्रकट हुए थे। इसी के साथ अन्य मान्यता के अनुसार इस दिन भगवान शिव का विवाह माता पार्वती के साथ हुआ था।

महाशिवरात्रि की विशिष्ट रात को ग्रह ऐसी जगह स्थापित होते हैं जिससे कुंडलिनी ऊर्जा जो एक प्राकृतिक ऊर्जा है। ये ऊर्जा रीढ़ की हड्डी के आधार पर चक्र में स्थित होती है। हड्डी सीधी रखने से ये सिर में पहुंच जाती है। शिवरात्रि कृष्ण पक्ष की चौदस रात्रि को आती है, इसके अगले दिन से पूर्णिमा का चक्र फिर शुरु हो जाता है। चतुर्दशी को विनाश की रात और नई शुरुआत की रात माना जाता है। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार माना जाता है कि इस रात कुंडलिनी ऊर्जा दूसरे दिनों की अपेक्षा अधिक बढ़ती है। जो शिव भक्त अति उत्साही होता है वो उसे ऊर्जा नुकसान पहुंचा सकती है और इसी के साथ इसे शरीर बदलने में समय नहीं लगता है।

ज्योतिषविदों के अनुसार माना जाता है कि भगवान शिव से जुड़ने के लिए महाशिवरात्रि की रात सबसे पवित्र होती है। ज्योतिषों के अनुसार इस रात अपनी रीढ़ की हड्डी को सीधा रखकर कई साधनाओं को पाया जा सकता है। मनुष्यों में शक्तियां ऊपर की तरफ जाती हैं। सिर तक शक्तियों को पहुंचाने के लिए इस रात को जागरण किया जाता है। अगली सुबह स्नान करने के बाद शिवलिंग को जल अर्पित करने के बाद शिव भक्त अपना व्रत खोलते हैं।

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