SI News Today Exclusive : यूपी के अफसरों का कारनामा, लोक निर्माण विभाग में वरिष्ठ अभियंता बने कनिष्ठ


SI News Today Exclusive: Exploitation of the officers of the UP, senior engineer in Public Works Department became junior.

  

प्रमुख संवाददाता लखनऊ : देश को भ्रष्टाचार से मुक्त कराने का दावा करने वाली बीजेपी पार्टी अपने शाषित राज्यों के विभागों में हुए फर्जीवाड़े की ही जाँच कराने से कतरा रही है. जिसके चलते एक बड़े फर्जीवाड़े में शामिल अफसरों और कर्मचारियों के हौसले बुलंद हैं. ये मामला कहीं और का नहीं बल्कि देश के सबसे बड़े राज्य कहे जाने वाले यूपी का है। यहाँ राज्य सरकार के अधीनस्त कार्य करने वाले लोक निर्माण विभाग में अवर अभियंता से सहायक अभियंता की प्रोन्नति किये जाने में शासन में तैनात अफसरों ने नियम -कानून को ही उठाकर ताक में रख दिए। जिसके चलते कई अभियंता इस प्रोन्नति से मिलने वाले लाभ से वंचित रह गये। इस मामले में सेवानिवृत हो चुके अभियंताओं ने अब अपनी न्याय की गुहार के लिए अदालत का दरवाजा खटखटाया है।

और नहीं कराई गयी निष्पक्ष जाँच-
गौरतलब है कि 19 जुलाई 2017 को इस घोटाले की शिकायत यूपी सीएम के पोर्टल पर की। इसके बाद इस घोटाले की जाँच 16 अगस्त 2017 को उसी विभाग को जाँच के लिए भेज दी गई। जिसने इस घोटाले को अंजाम दिया था. नतीजतन ये शिकायत लोक निर्माण विभाग के अफसरों की मेज पर पड़ी धूल चाटती रही और अभियंताओं के कई बार अनुस्मारक भेजने के बाद भी इस घोटाले की जाँच ही नहीं की गयी। इससे तंग आकर अभियंताओं ने इस घोटाले की शिकायत पीएमओ कार्यालय से की।

पीएमओ का आदेश ठंडे बस्ते में डाला-
26 फरवरी 2018 को पीएमओ कार्यालय ने इस घोटाले की निष्पक्ष जाँच कराये जाने के लिए यहाँ सचिवालय में तैनात अनुसचिव कल्याण बनर्जी को भेज दी. लेकिन इस बार भी ये जाँच करीब तीन साल तक इसलिए नहीं कराई जा सकी क्योंकि इसे किसी अन्य विभाग से कराया जाना था. बताया जाता है कि जैसे -तैसे अपने पास से इस बला को टालने के लिए इस अफसर ने फिर से इस शिकायत को लोक निर्माण विभाग में ही जाँच के लिए भेज दिया गया। दरअसल इस घोटाले की जाँच इस बार भी इसलिए नहीं की जा सकी क्योंकि अपने विभाग के बड़े अफसरों के खिलाफ कोई क्यों जाएगा। इसका नतीजा ये है कि सेवानिवृत्त हो जाने के बाद भी आज कई अभियंता मानसिक पीड़ा और अपनी सुविधाओं से वंचित हैं।

क्या है पूरा मामला ?
दरअसल 2 नवम्बर 2013 को सुप्रीमकोर्ट के निर्णय के अनुपालन में नियमावली 1988 के तहत 10 वर्ष की सेवा पूरी करने वाले अवर अभियंताओं की सेवा मानते हुए उन्हें स्थायी सहायक अभियंता वि \ यां के रूप में नियक्ति करने की स्वीकृति शासनादेश 11 अक्टूबर 1994 के तहत की गयी।इसी संदर्भ में शासन ने 4 जुलाई 1995 को अपनी अंतरिम ज्येष्ठता सूची जारी की। इसके साथ ही शासनादेश 3 जुलाई 1990 और 28 सितंबर 1992 में निहित प्राविधानों के तहत वेतनमान रु 3000 -100 -3500 -125 -4500 सभी 54 सहायक अभियंताओं का क्षेत्रीय मुख्य अभियंताओं द्वारा स्वीकृत गया।

इस बीच शासनादेश संख्या -1631 ई बी आर /23 /3 /1131 / 85 दिनांक 28 /8 /85 को 8 कनिष्ठ अवर अभियंताओं को सहायक अभियंता के पद पर एक वर्ष के लिए प्रोन्नति दे दी गई. सुप्रीम कोर्ट के आदेश के डिक्टम 6 के मुताबिक कार्यवाही न होने के कारण उनसे वरिष्ठ अवर अभियंताओं ने हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच का दरवाजा न्याय के लिए खटखटाया। याचिका संख्या -1145 /(एस एस)/1994 और 2489 //(एस एस)/ 1997 द्वारा संकटा प्रसाद सिंह व अन्य कैलाश चंद्र मिश्र बनाम उत्तर प्रदेश राज्य दाखिल की गई।इस दौरान शासनादेश संख्या -1611 /23 -4 -99-12 -113 ( एन जी )/97 दिनांक 25 /02 /1999 के द्वारा इन आठ अभियंताओं में से छह को प्रोन्नति 29 अगस्त 1985 की जगह 1 जनवरी 1985 मानते हुए सुप्रीम कोर्ट के आदेश के तहत 11 अक्टूबर 1994 से नियमित कर दिया गया। मजेदार बात है कि भ्रष्टाचार का सबसे ताजातरीन नमूना तो यही है कि जब हाईकोर्ट में याचिका संख्या -1145 /(एस एस)/1994 और 2489 //(एस एस)/ 1997 लंबित थी तो ये विनयमितीकरण किया जाना तथा 29 /08 /1985 को 1 /1 /1985 मानते हुए न्याय संगत नहीं था, लेकिन शासन में बैठे अफसरों ने अपने निजी स्वार्थों के चलते इन अभियंताओं को प्रोन्नति दे दी। याचिका संख्या -1145 के प्रस्तर 22 में इन कनिष्ट अभियंताओं को विवादित माना है। इस याचिका के काउंटर ऐफीडेविड 13 दिसंबर 1994 को प्रस्तर 22 के जवाब में शासन ने ये कहा है कि उपरोक्त परीक्षण कर लिया जायेगा।

मानसिक तनाव से जूझ रहे हैं अभियंता-
याचिका संख्या 1145 /1994 के पूरक ऐफीडेविड प्रस्तर 13 में शासन द्वारा दिनांक -25 /02 /1999 के आदेश को 29 /08 /1985 के आधार पर 1 जनवरी 1985 मानने का विरोध किया है।जिसके चलते हाईकोर्ट ने इन याचिकाओं निष्तारण करते हुए 5 जनवरी 2001 को याचिका संख्या 1145/एस एस/94 के प्रस्तर के काउंटर ऐफीडेविड पर उपरोक्त प्रोन्नतियों को पुन : परीक्षण करने आदेश जारी कर दिए. हाईकोर्ट के आदेश का अनुपालन सुप्रीम कोर्ट के आदेश से 54 अभियंताओं को नियुक्त किया गया, उनमें से 42 अभियंताओं का परीक्षण कर 21 को मूल पद (अवर अभियंता) और 20 तदर्थ कर दिए गए। जबकि हाईकोर्ट के आदेशानुसार जिन आठ अभियंताओं के खिलाफ कार्यवाही की जानी थी, उनके खिलाफ कोई कार्यवाही नहीं की गई। बहरहाल न्याय की गुहार लगा रहे इन 42 अभियंताओं को इसके चलते काफी धन का तो नुक्सान हुआ ही है। साथ ही उन्हें मानसिक तनाव से भी जूझना पड़ रहा है। इन कनिष्ठ अभियंताओं पर हाईकोर्ट के आदेश से कोई कार्यवाही नहीं की गयी। जिसके चलते इनके हौसले बुलंद हैं और ये अपने वरिष्ठों को मुंह चिड़ा रहे हैं। इससे ज्यादा शासन का भ्रष्टाचार और क्या हो सकता है।

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