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जब नदियां बोलेंगी – हम लेके रहेंगे आज़ादी-विवेक मिश्रा

जब नदियां बोलेंगी – हम लेके रहेंगे आज़ादी-विवेक मिश्रा

जब नदियां बोलेंगी – हम लेके रहेंगे आज़ादी-विवेक मिश्रा

Source :Viwe Source

विवेक मिश्रा -बाढ़ से बचने​ की कला और विज्ञान जितना मर्जी उतना समझ लीजिए। अंत यही होगा कि हमें उनके घर-आंगन को छोड़ना ही होगा। यही अटल उपाय है। जिसे हम बाढ़ कहते हैं वह नदी का तनिक फैलाव भर है। जिस दिन नदियां यह उदघोष करेंगी कि, हम लेके रहेंगे आज़ादी उस दिन हम सब बेबस और लाचार होंगे। हममें से कोई कोर्ट में याचिका दाखिल कर इस पर एतराज भी नहीं जता पाएगा।

बाढ़ का हर साल विभीषक होते जाना हमारा पक्ष है। इस बारे में नदियों का पक्ष भी लिया जाना चाहिये।वो कहती हैं कि हम तो अपनी ही थोड़ी सी बची हुई जगह में कम-ज़्यादा, दाएं-बाएं जब घूमती हैं तो आप शोर मचाते हैं।

लोकतंत्र की परिभाषा बदल दी गयी है। माफ कीजिये, लेकिन विनम्रता से हमें यह स्वीकारना होगा कि यह सिर्फ किसी पार्टी को हराने और जिताने का खेल भर रह गया है। सारे दांव-पैतरे और उसके लिए पक्ष-विपक्ष में लिखा-पढ़ा जाना इस खेल को ही स्वारथ करता है। नदी, तालाब, पोखर, पानी का संचय, जैसे शब्द इस व्यवस्था में हैं कहीं? यहां सिर्फ मरण है और उससे जुड़ा सवाल है।

आप पुरातन कह सकते हैं, यकीन करना मुश्किल होगा कि कोई सौ साल पहले बिना योजना और नीति आयोग बनाये नदी और पानी का बचाव और संचयन समाज करता था। दूसरा बाढ़ की तारीखों के मुताबिक समाज खुद को समायोजित करता था। बाढ़ की आ रहीं तस्वीरें हम सभी को विचलित कर रहीं हैं। पुल, सड़क सब बह जाएं लेकिन जिन्दगियों का बह जाना दुखद है। आज वो समाज बह रहा है जो पानी से मित्रवत था। गांव था।

शहरों के लिए बाढ़ की विभीष्का कौतुहल का विषय होता है। अभी बरसात के वक़्त घरों में पानी घुसना शुरू हुआ है जब बाढ़ का पानी घरों तक पहुंचना शुरू होगा तब अक्ल खुलेगी। शोर में आवाज़ होगी। वरना गांव के शोर में आवाज़ भी नहीं होती। तब न राजनीति के चाणक्य काम आएंगे और न ही महागठबन्धन।

जो पानी से मित्रवत थे, अब वो भी नदी की विभीषका से घबरा रहे। यह समय है की समाज चाणक्यों के गणित से निकलकर एकजुट हो और नदियों के बारे में फिर सोचे। जिस दिन ऐसा समाज बना वह दुनिया की सबसे बड़ी कल्याणकारी सरकार होगी।

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