Sunday, February 25, 2024
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पाना चाहते हैं पूरे नवरात्र का फल एक ही बार में, तो करे ये जाप…

SI News Today

नवरात्र हिन्दुओं का ऐसा पर्व है जिसमें मां दुर्गा का पूजन किया जाता है। नवरात्र का अर्थ है नौ रातों का समूह, जिसमें मां दुर्गा के अलग-अलग रूपों की पूजा की जाती है। इन नौ दिनों में हर कोई अपने-अपने तरीके से माता की आराधना करता है लेकिन उद्देश्य केवल एक होता है माता की कृपा प्राप्त करना।

नवरात्र के नौ दिनों में जो भी भक्त मां की आराधना सच्चे दिल से करता है उसे मनचाहा वरदान प्राप्त होता है। लेकिन जो लोग मां की विशेष कृपा पाना चाहते हैं तो आपको बता दें कि नवरात्र के नौ दिन प्रात:, मध्याह्न और संध्या के समय भगवती दुर्गा की पूजा करनी चाहिए। श्रद्धानुसार अष्टमी या नवमी के दिन हवन और कुमारी पूजा कर भगवती को प्रसन्न करना चाहिए। नवरात्र में हवन और कन्या पूजन अवश्य करवाना चाहिए। नारदपुराण के अनुसार हवन और कन्या पूजन के बिना नवरात्र की पूजा अधूरी मानी जाती है। साथ ही नवरात्र में मां दुर्गा की पूजा के लिए लाल रंग के फूलों व रंग का अत्यधिक प्रयोग करना चाहिए। नवरात्र में “श्री दुर्गा सप्तशती” का पाठ कराने का प्रयास करना चाहिए। श्रीमद्देवी भागवत के अनुसार नवरात्र पूजा से जुड़ी कुछ विशेष बातें निम्न हैं:

– यदि श्रद्धालु नवरात्र में प्रतिदिन पूजा ना करवा सके तो अष्टमी के दिन विशेष पूजा कराने से वह सभी फल प्राप्त कर सकता है।
– अगर श्रद्धालु पूरे नवरात्र में उपवास ना कर सके तो तीन दिन उपवास करने पर भी वह सभी फल प्राप्त कर लेता है। कई लोग नवरात्र के प्रथम दिन और अष्टमी एवम नवमी का व्रत करते हैं। शास्त्रों के अनुसार यह भी मान्य है।
– नवरात्र व्रत देवी पूजन, हवन, कुमारी पूजन और ब्राह्मण भोजन से ही पूरा होता है।

नवरात्रो में चंडी पाठ अवश्य करवाना चाहिए इससे सभी बाधाए ख़त्म हो जाती है और आने वाला समय सुखमय होता है। महागौरी ने इस भूलोक में रिद्धि-सिद्धि प्राप्त करने के लिए एक महाकुंजीका स्तोत्र की रचना की और जिसका मंत्र निम्नलिखित है। इस मंत्र को जो नित्य ही देवी दुर्गा का ध्यान करके पढ़ेगा। उसको इस संसार में धन-धान्य, समृद्धि और सुख शांति के अलावा सभी प्रकार के निर्भय जीवन व्यतीत करने के सुख साधन मिलेंगे।

ओम् ऐं हीं क्लीं चमुण्डायै विच्चे।। ओम् ग्लौं हुं क्लीं जूं सः ज्वालय ज्वालय ज्वल ज्वल प्रज्वल प्रज्वल ऐं हीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे ज्वल हं सं लं क्षं फट् स्वाहा।।

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