Could create table version :No database selected सब बरी तो हत्यारा कौन?? - SI News Today
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सब बरी तो हत्यारा कौन??

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ब्यूरो S.I.न्यूज़ टुडे-(पुष्पेन्द्र प्रताप सिंह): अजय प्रकाश उर्फ मन्ना सिंह हत्या कांड की कहानी उत्तर प्रदेश के पूर्वांचल क्षेत्र के हर चौराहे पर आज भी सुनने को मिल जाती है।चाय की चुस्कियां लेते यहां के नौजवानों के मन को खंगालने से पता चलता है कि आज भी यहां राजनीति का मुद्दा विकास न होकर के वर्चस्व ही है। जहां एक तरफ आजमगढ़, मऊ,गाज़ीपुर,बलिया,जौनपुर जैसे क्षेत्र के युवाओं ने प्रतिस्पर्धी परीक्षाओं में अपना एक अलग मुकाम बनाया है वहीं अपराध के प्रतिस्पर्धिता में भी यहां के युवा एक अलग ही पहचान रखते हैं। इन क्षेत्रों के युवाओं के दिल में खूनी वर्चस्व के जंग की कहानी की छाप देखने को मिलती है। वर्चस्व की जंग की शुरुवात मंडी परिषद की ठेकेदारी को लेकर 1988 में शुरू हुई जब सच्चिदानंद राय मंडी ठेकेदार को गोलियों से भून दिया गया। तब प्रदेश स्तर पर एक नाम सामने आया माफिया डॉन मुख्तार अंसारी। गाज़ीपुर के मोहम्मदाबाद के रहने वाले सम्पन्न और नामी परिवार से ताल्लुक रखने वाले इस माफिया डॉन की कहानी भी बिल्कुल फिल्मी है। सच्चिदानंद राय की हत्या का खौफ अभी खत्म ही हुआ था कि इस दुर्दान्त अपराधी मुख्तार अंसारी का नाम त्रिभुवन सिंह के कांस्टेबल भाई राजेंद्र सिंह की हत्या में भी सामने आया। और यह आहुति भी वर्चस्व की आग को बनाये रखने के लिए दी गयी थी। इस कुख्यात माफिया सरगना द्वारा वर्चस्व की जंग में ऐसी तमाम हत्याएं कराई गयीं जिसमे ये प्रत्यक्ष रूप से या अप्रत्यक्ष रूप से सम्मिलित रहा है। सरकारी ठेके, शराब के ठेके, कोयला के काले कारोबार,हत्या,अपहरण,फिरौती को इस कुख्यात अपराधी ने हैंडल करना शुरू किया। इसी बीच इसी वर्चस्व की जंग में इस कुख्यात माफिया का सामना माफिया बृजेश सिंह से हुआ। दोनों माफियाओं में वर्चस्व की जंग को लेकर रार बढ़ती चली गयी और इन दोनों के गैंग के बीच खूनी संघर्ष बढ़ता चला गया जिसमें रह रह कर पूरा पूर्वी उत्तर प्रदेश अपराध और माफिया गिरी के आग में जलता रहा। इसी बीच 1991 में पुलिस की गिरफ्त से दो पुलिस कर्मियों को गोली मारकर फरार इस अपराधी ने 1996 में बहुजन समाजवादी पार्टी का दामन थाम कर राजनीति में प्रवेश किया और मऊ विधानसभा क्षेत्र से विधानसभा चुनाव जीता। राजनीत में आने के बाद भी इस अपराधी ने अपराध से दामन अलग नहीं किया और कई हत्याओं में इसका नाम रह रह कर आता रहा। इसी बीच 1997 में पूर्वांचल के सबसे बड़े कोयला व्यवसायी रुंगटा के अपहरण के बाद इस कुख्यात का नाम क्राइम की दुनिया में देश में छा गया। अब समस्त उत्तर भारत मे माफिया का नाम लेते ही मुख्तार का चेहरा सामने आने लगा था। 90 के दशक में महाविद्यालय और कॉलेजों में भी युवाओं के बीच तेज रफ्तार गाड़ी और ऑटोमैटिक हथियार की लत सी लग गयी जिसका फायदा मुख्तार जैसे माफियाओं को होने लगा। अब इनको शूटर ढूंढने के लिए कहीं जाने की जरूरत नहीं पड़ती थी। 2002 में माफिया ब्रजेश सिंह ने मुख्तार अंसारी के काफिले पर हमला कराया। इसमें मुख्तार के तीन लोग मारे गए। ब्रजेश सिंह घायल हो गया और अंडरग्राउंड भी। इसके बाद मुख्तार अंसारी पूर्वांचल में संगठित अपराध क्षेत्र का अकेला माफिया बचा। इसी बीच 2005 मे मऊ में भड़की हिंसा से इस दुर्दान्त अपराधी का नाम आया जिसको बाद में खारिज़ कर दिया गया। और इस अपराधी द्वार 2005 में गाजीपुर पुलिस के समक्ष आत्मसमर्पण कर दिया गया। इसी दौरान कृष्णानंद राय से मुख्तार का भाई अफजल अंसारी चुनाव हार गया। मुख्तार पर आरोप है कि 29 नवम्बर 2005 में उसने शार्प शूटर मुन्ना बजरंगी और अतिकुर्रह्मान उर्फ बाबू की मदद से गोडउर के पास 5 साथियों सहित कृष्णानंद राय की हत्या करवा दी। और कुछ दिनों बाद कृष्णानंद राय की हत्या के गवाह शशिकांत राय की भी हत्या 2006 में रहस्यमयी परिस्थितियों में हो गयी। शशिकांत वही व्यक्ति था जिसने मुख्तार और बजरंगी के शूटर अंगद राय और गोरा राय की पहचान की थी। इस हत्या से पूरे राजनीतिक दलों में खलबली मच गई पूरा उत्तर प्रदेश मऊ क्षेत्र को इस अपराधी के नाम से जानने लगा। जेल में रह कर भी इस कुख्यात अपराधी का नेटवर्क कभी कमज़ोर नहीं पड़ा। शासन हो या प्रशासन मुख्तार अंसारी ने सबको अपनी आवश्यक्तानुसार उपयोग किया और आज भी कर रहा है। इस कुख्यात अपराधी को मुस्लिम वर्ग का विशेष संरक्षण प्राप्त है। इस वर्ग के लोग इसको अपना मसीहा बताते हैं। और आज की राजनीतिक परिदृश्यों के अनुसार इस दुर्दान्त अपराधी की मऊ और आस पास के विधानसभा क्षेत्रों में तूती बोलती है। समय अभी बीता ही था कि मऊ क्षेत्र के प्रसिद्ध ठेकेदार और कभी मुख्तार के पार्टनर रहे अजय प्रकाश उर्फ मन्ना सिंह जो कि लोक निर्माण विभाग मऊ के नामी ठेकेदार थे कि दिन दहाड़े 29 अगस्त 2009 को कोतवाली शहर के नरई बांध के पास स्थित यूनियन बैंक के सामने फिल्मी अंदाज में बाइक सवार बदमाशों द्वारा गोलियों से छलिनी कर के हत्या कर दी गयी। इसमें उनके साथी राजेश राय की भी मौत हो जाती है। मामले में हरेंद्र सिंह की तहरीर पर पुलिस ने मुख्तार सहित 11 लोगों पर केस दर्ज किया। अभी जांच चल ही रही थी कि इस हत्या कांड के मुख्य गवाह राम सिंह मौर्या की भी हत्या कर दी जाती है। जिस वजह से मुख्तार का खौफ पूरे मऊ और आस पास के क्षेत्रों में उसके विरोधियों के मन ने बस गया। मन्ना सिंह की हत्या का मुख्यकारण भी ठेकेदारी वर्चस्व ही था। एक समय था जब मन्ना सिंह ने ही मुख्तार को मऊ लोकनिर्माण की ठेकेदारी का स्वाद चखाया फिर बाद में किसी कारण वश दोनों अलग हुए। ये बात मुख्तार को रास नही आ रही थी। इसी बीच मन्ना सिंह की हत्या बिल्कुल उसी तरीके से हुई जैसा कि आज तक मुख्तार द्वारा करवाई जाती रही है। मन्ना सिंह की हत्या में 11 आरोपियों पर मुकदमा चला जिसमे थे मुख्तार अंसारी, राकेश पाण्डेय उर्फ हनुमान पाण्डेय, अनुज कनौजिया, उमेश सिंह, रजनीश सिंह, उपेंद्र सिंह उर्फ कल्लू ,संतोष सिंह, पंकज सिंह ,अमरेश कन्नौजिया, अरविंद यादव, और जामवंत उर्फ राजू। यह मुकदमा 8 साल चला 22 गवाह चिन्हित किये गए, जिसमे से 17 गवाह पेश हुए। मन्ना सिंह का परिवार इंसाफ के लिए पिछले 8 सालों से इंतज़ार करता रहा। इन 8 सालों में कई जज आये और गए हर पहलू पर सबूत और गवाह के बल पर सांस लेते इस कानून को इस मामले में असहाय और कमज़ोर देखा गया। एक खौफ़ लोगों के मन में समाया था कि जो मुख्तार की खिलाफत करेगा वो मरेगा। सूत्रों की मानें तो इसी मुकदमे के मुख्य गवाहों में से एक अमरजीत सिंह जो कि एक अभियुक्त उपेंद्र सिंह उर्फ कल्लू के चाचा और मन्ना सिंह के भाई अशोक सिंह के मित्र भी थे। लेकिन निजी स्वार्थ के चलते या मुख्तार के डर वश इन्होंने चुप्पी साध ली जिसका फायदा उस कुख्यात माफिया को हुआ। इसी तरह एक गवाह पीयूष सिंह विसेन जिसका मकान हत्यास्थल के पास ही था और सूत्रों की मानें तो यह उस मामले का प्रत्यक्षदर्शी गवाह था जो कि किन्ही कारणों से साफ मुकर गया। अगर देखा जाए तो जेल के अंदर से ही माफिया मुख्तार ने इस मुकदमे को जीतने में शाम दाम दण्ड भेद हर नीति का इस्तेमाल किया लेकिन यह सब कुछ हमारे अंधे कानून को नहीं दिखा। 8 साल से चल रहे इस मामले में मन्ना सिंह की हत्या में मुख्तार की संलिप्तता कितनी है यह तो मऊ की जनता बखूबी जानती है। सालों से लटके इस मामले को फास्ट ट्रैक कोर्ट में लाया गया और आजमगढ़ के मुबारकपुर के निवासी फास्ट ट्रैक कोर्ट के जज आदिल आफताब अहमद ने उत्तर प्रदेश अपराध जगत के सबसे दुर्दांत और कुख्यात माफिया मुख्तार अंसारी को निर्दोष पाया और बाइज्जत इस मुकदमे से बरी कर दिया। खैर जज साहब का फैसला तो कोर्ट के अंदर पंहुचाये गए गवाह और बनाये गए सबूतों के बिनाह पर है। इस फैसले ने फिर से एक बार साबित किया जिसकी लाठी उसी की भैंस। अदालत ने मुख्तार सहित आठ लोगों को बरी किया। और दोषी मात्र तीन लोगों को पाया जिसमे अमरेश कन्नौजिया,अरविंद यादव और जामवंत उर्फ राजू सम्मिलित हैं। अदालत में प्रत्यक्षदर्शियों की मानें तो फैसला आने के बाद अमरेश कन्नौजिया ने इसका काफी विरोध किया और जज साहब के सामने अपनी बात को रखते हुए कहा कि बाकी सब भी बराबर के अपराधी है और सज़ा मात्र हमलोगों को बरहाल यह कोई प्रमाणित बात नहीं है। और अगर इतिहास और वर्तमान परिस्थितियों को टटोला जाए तो सज़ा पाए तीनों अभियुक्त में इतना दम नहीं दिखता की बिना किसी सरपरस्ती के ये मन्ना सिंह जैसे प्रभावशाली व्यक्ति की हत्या इस तरीके से कर पाएं। इस फैसले से मन्ना सिंह का परिवार निराश दिखा और उन्होंने माननीय उच्च न्यायलय में विश्वास दिखाया और यह कहा कि हमको इंसाफ जरूर मिलेगा। मुख्तार के करीबी और इस मामले में अभियुक्त लोगों को कुछ समय पहले दिल्ली के एक पांच सितारा होटल में किसी जज के साथ पार्टी मनाते हुए सोशल मीडिया पर देखा गया जो यह इंगित करता है कि इनकी पैठ शासन प्रशासन के साथ साथ न्याय व्यवस्था में उतनी ही जबरदस्त है। और उस पैठ के रसूख के बल पर ये किसी भी फैसले को बदलवाने में सक्षम हैं। और यह कोई इस तरह का नया फैसला नही है इस रसूखदार अपराधी के खिलाफ इस तरह के कई मामलों में अदालत और कानून को ढाल बना कर ये बचता चला आया है। इसी तरह एक मामला 1999 में सामने आता है जब इस अपराधी पर आरोप लगा कि इसके इशारे पर जेल अधीक्षक आर.के.तिवारी की हत्या लखनऊ में दिन दहाड़े करवाई गई इस मामले में कई अपराधियों को चिन्हित किया गया जिसमें उस समय के लखनऊ विश्वविद्यालय के छात्र नेता और आज के पूर्व विधायक अभय सिंह और बरेली के जेलर हत्याकांड के आरोपी गैंगस्टर राजेश यादव को चिन्हित किया। इस मामले में भी इसी तरह सारे अपराधियों को बरी कर दिया गया था। और देखने वाली बात यह है कि जेलर हत्याकांड में बरी आरोपी अपने को जेलर का हत्यारा बता कर अपने अपने क्षेत्रों में अपनी नेता गिरी और धौंस आज भी जमाते फिर रहे हैं। और अगर भारत का इतिहास उठा कर देखा जाए तो माननीय न्यायालय द्वारा इस तरह के कई मामले हैं जिसमे पर्दे के पीछे के असली खिलाड़ी को संदेह का लाभ मिलते देखा गया है। और अगर इन अपराधियों का इतिहास देखें तो प्रश्न यह उठता है कि अगर मन्ना सिंह और जेलर आर.के.तिवारी की हत्या में सब बरी तो हत्यारा कौन??

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