Thursday, July 25, 2024
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लखनऊ: सरकारी डॉक्टर निजी में दे रहे ‘ऑनकॉल’ सेवाएं…

SI News Today

लखनऊ: सरकारी अस्पतालों के डॉक्टरों का ‘ऑनकॉल’ धंधा फल-फूल रहा है। सरकार से नॉन प्रैक्टिस एलाउंस (एनपीए) लेने के बावजूद उनका निजी प्रैक्टिस से मोह भंग नहीं हो पा रहा है। वहीं अस्पताल प्रशासन भी ऐसे डॉक्टरों पर लगाम लगाने में असहाय साबित हो रहा है।

यूनाइटेड हॉस्पिटल में सीएमओ टीम की जांच में लोहिया अस्पताल के निलंबित चिकित्सक डॉ. एके श्रीवास्तव का नाम आने पर प्राइवेट प्रेक्टिस का मामला फिर गरमा गया है। स्वास्थ्य महानिदेशक ने संबंधित मसले पर रिपोर्ट तलब की है। डॉ. श्रीवास्तव हर माह शपथ पत्र देने के साथ-साथ सरकार से गुजारा भत्ता के तौर पर आधा वेतन भी उठा रहे थे।

इस खेल में केजीएमयू, लोहिया, बलरामपुर, सिविल के चिकित्सक अधिक संलिप्त हैं। वर्षों से एक ही अस्पताल व शहर में तैनात ईएनटी, आॅर्थोपेडिक, आई, यूरो, गैस्ट्रो, नेफ्रो व जनरल सर्जन जहां निजी अस्पतालों में मरीजों का ऑपरेशन करने में मशगूल हैं। वहीं फिजीशियन खुलेआम घरों में क्लीनिक चला रहे हैं।

अस्पताल प्रशासन सब कुछ जानते हुए भी अनजान बना हुआ है। वहीं ऊंची पहुंच वाले इन चिकित्सकों का वर्षो से स्थानांतरण भी नहीं हो रहा है।

एनेस्थेटिस्ट भी रहते हैं बुक: सरकारी अस्पतालों में तैनात एनेस्थेटिस्ट भी निजी अस्पतालों में बुक रहते है। प्रत्येक एनेस्थेटिस को प्रति केस के लिए दो से पांच हजार रुपये तक दिया जाता है।

एनपीए की हो वसूली तो लगे लगाम: सरकारी अस्पतालों के प्रत्येक डॉक्टर को एनपीए के तौर पर मूल वेतन का 25 फीसद दिया जाता है। इस हिसाब से हर माह डॉक्टर को वेतन के साथ हजारों रुपये नॉन प्रैक्टिस एलांउस के तौर मिलता है। बावजूद डॉक्टरों में निजी प्रैक्टिस की लत नहीं छूट रही है।

ब्याज सहित होनी चाहिए वसूली: विशेषज्ञों का कहना है कि निजी प्रैक्टिस में संलिप्त पाए गए डॉक्टरों से एनपीए की ब्याज सहित वसूली हो। साथ ही वर्षो से तैनात डॉक्टरों का गैर जनपदों में स्थानांतरण हो तो इस धंधे पर काफी हद तक लगाम लगाई जा सकती है।

कोर्ट ने किया था तलब: केजीएमयू के डॉक्टरों की प्राइवेट प्रैक्टिस का मामला तो कोर्ट तक पहुंच चुका है। वहीं सरकारी अस्पतालों में दस वर्ष से अधिक तैनात डॉक्टरों की सूची भी सरकार से कोर्ट तलब कर चुका है।

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