Saturday, April 13, 2024
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वोट बैंक और बलिदान के लिए माया का इस्तीफा बम!

SI News Today

लखनऊ: मानसून सेशन के दूसरे दिन मंगलवार को राज्यसभा में हुए हंगामे के बाद मायावती ने राज्यसभा की सदस्यता से इस्तीफा दे द‍िया। बता दें, मायावती ने सहारनपुर हिंसा का मुद्दा उठाते राज्यसभा में कहा था क‍ि यूपी में दलितों पर अत्याचार हो रहा है। इसके बाद जब उप सभापति पीजे कुरियन ने उन्हें रोकने की कोशिश की तो वे उन पर भड़क गईं। मायावती ने कहा, ”मुझे बोलने नहीं दिया जा रहा है। लानत है ऐसी सदस्यता पर कि जिस समाज से मैं आती हूं, उसी की बात सदन में नहीं रख पा रही है। अगर मेरी बात नहीं सुनी गई तो मैं इस्तीफा दे दूंगी।” बता दें, बसपा चीफ का राज्यसभा में अप्रैल 2018 को कार्यकाल खत्म हो रहा है। ऐसे में पार्टी के पास इतने आंकड़े भी नहीं हैं कि वह 2018 में एक बार फिर राज्यसभा में पहुंच सकें। 10 में से एक सीट मायावती की भी…

– 2 अप्रैल 2018 को राज्यसभा की 10 सीटें खाली हो रही हैं। इन 10 में से एक सीट मायावती की भी है। इसके अलावा बसपा से ही मुनकाद अली भी राज्यसभा सांसद हैं। उनका भी कार्यकाल खत्म होने वाला है।

– यही नहीं, 5 मई 2018 को भी यूपी विधानपरिषद की 13 सीटें खाली हो रही हैं, लेकिन मायावती 2017 के संख्याबल के आधार पर वहां भी नहीं जा पाएंगी।

बीजेपी ने मायावती के वोट बैंक में लगाई सेंध
– यूपी विधानसभा के 2007 चुनाव में बसपा को पूर्ण बहुमत मिला था और पार्टी का वोट शेयर भी 30 फीसदी से ज्यादा था। ये आंकड़े मायावती के लिए इसलिए अहम रहे, क्योंकि उन्हें राज्य में उनके दलित वोट बैंक के अलावा अगड़ी जातियों से भी वोट मिला।

– लेकिन 2017 के विधानसभा चुनावों में बसपा को 403 सीटों में से सिर्फ 19 सीटों पर जीत मिली थी। मायावती का वोट बैंक माने जानी वाले दलित बाहुल्य सीटों में से भी 84 फीसदी सीटें बीजेपी के खाते में गईं। दलित वोट बैंक का 41 फीसदी वोट भी बीजेपी को मिला।

मायावती के ल‍िए अस्त‍ित्व बचाना आसान नहीं होगा: एक्सपर्ट
– इन आंकड़ों से अब मायावती के लिए मुश्किलें खड़ी हो गई हैं। बसपा इस बार उन्हें संसद भेजने के लिए सशक्त नहीं है। पॉल‍िट‍िकल मामलों के एक्सपर्ट के. व‍िक्रम राव ने बातचीत में बताया, ”अगर मायावती इस्तीफा देती हैं तो राज्यसभा में उनकी वापसी मुश्किल हो जाएगी, क्योंकि उनके पास इतने विधायक नहीं हैं। 19 विधायकों से विधानपरिषद में भी पहुंचना मुश्किल होगा।”

– ”चुनावों में जो बोलबाला मायावती का दल‍ित वोटों के दम पर था, वो भी अब नहीं बचा है। वजह है क‍ि मायावती अपने 4 बार के सीएम कार्यकाल के दौरान बातों के अलावा उनके लिए कुछ खास नहीं कर पाईं। उनके सीएम बनने के बाद दल‍ितों के जीवन में कोई खास परिवर्तन भी नहीं आया।”

– ”ऐसे में मायावती का यूपी में खुद का अस्तित्व बचाए रखना भी मुश्किल है, क्योंकि रामनाथ कोविंद को बीजेपी ने जिस तरह प्रेसिडेंट की कुर्सी तक पहुंचाया, उसने मायावती को काफी हद तक डैमेज किया है।”
स‍िम्पैथी,वोट बैंक और बलिदान का नहीं मिलेगा फायदा

– सीनियर जर्नलिस्ट रतनमणि लाल कहते हैं, ”ऐसा लगता है क‍ि मायावती इस्तीफा देने से पहले सोच रही थीं कि इससे उन्हें तीन फायदे हो सकते हैं। पहला, वह इस्तीफा देकर दलितों की सिम्पैथी गेन कर सकती हैं। वे दलितों के बीच ये मैसेज भेजना चाहती हैं कि मैंने उनके लिए राज्यसभा का पद भी छोड़ दिया। हालांकि, ये सभी जानते हैं कि मायावती का कार्यकाल 2018 में खत्म हो रहा है। ऐसे में एक तरह से ये स्टंट चला गया है।”

– ”दूसरा, मायावती खुद को उदाहरण के तौर पर पेश करना चाहती हैं। सुबह ही अपने बयान में उन्होंने अंबेडकर का नाम लिया था। इससे यही लगता है कि वह खुद को दलितों के बीच एक उदाहरण के तौर पर पेश करेंगी।”

– ”तीसरा, अब मायावती देशाटन कर सकती हैं, ताकि घूम-घूमकर वे बीजेपी के दलित प्रेम को उजागर कर सकें और बीजेपी के खिलाफ एक माहौल बना सकें।”

– रतनमणि लाल आगे कहते हैं, ”चाहे सिम्पैथी हो, वोट बैंक हो या बलिदान, अब मायावती के कुछ भी काम आने वाला नहीं है। दरअसल, मायावती के साथ उनका पारंपरिक वोट बैंक जाटव तो साथ है, लेकिन यूपी विधानसभा चुनाव में गैर जाटव दलित दूर हुआ है। यूपी में 21 से 22 फीसदी दलित वोट हैं, जिसमे से 14% जाटव और 8% गैर जाटव दलित हैं।”

– ”यूपी चुनाव में 85 रिजर्व सीटों पर बसपा 24% ही वोट मिले। वहीं, 2012 विधानसभा चुनाव में 27% और 2014 लोकसभा चुनावों में उसे 23% वोट मिले थे।”

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