Tuesday, February 27, 2024
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जस्टिस कर्णन ने खारिज किया सुप्रीम कोर्ट का ऑर्डर, कहा- मैं नेपोलियन और डॉ. अम्बेडकर का दत्तक पुत्र हूं

SI News Today

सुप्रीम कोर्ट द्वारा गिरफ्तारी का आदेश दिए जाने के करीब एक घंटे बाद ही कोलकाता हाई कोर्ट के जज सीएस कर्णन ने देश की सर्वोच्च अदालत के आदेश को खारिज करते हुए कहा कि वो पहले ही सुप्रीम कोर्ट के आदेश को रद्द करने वाला आदेश दे चुके हैं। जस्टिस कर्णन ने कहा, “सुप्रीम कोर्ट ने सुबह 11 बजे आदेश दिया। मैंने सुबह 11.20 पर सुप्रीम कोर्ट के आदेश को रद्द करने का आदेश दिया। वो मीडिया को मेरे बयान न छापने का आदेश कैसे दे सकते हैं?” जस्टिस कर्णन चेन्नई के चेपक गवर्नमेंट गेस्ट हाउस में मीडिया से मुखातिब थे।

सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार (नौ मई) को मीडिया को जस्टिस कर्णन के किसी भी बयान को न छापने के लिए कहा था। कर्णन ने अपने लेटर पैड पर लिखा एक लिखित बयान जारी किया और कहा कि ये उनका आदेश है। जस्टिस कर्णन ने कहा कि उन्होंने सीबीआई को सुप्रीम कोर्ट के सात जजों के खिलाफ एससी-एसटी एक्ट के तहत मामला दर्ज करने का आदेश दिया है।

जस्टिस कर्णन ने कहा, “क्या मैं असमाजिक तत्व हूं? क्या मैं आतंकी हूं? वो प्रतिबंध का आदेश कैसे दे सकते हैं? बगैर मेरा पक्ष सुने उन्होंने मेरे खिलाफ कई फैसले दिए हैं? मैं गिरफ्तारी या जेल से नहीं डरता। आम जनता मेरे साथ है। ये न्यायिक व्यवस्था की पूर्ण विफलता है। मैं पहले ही जेल देख चुका हूं।” जस्टिस कर्णन ने बताया कि हाई कोर्ट के जज के तौर पर वो करूर, शिवगंगा स्थित जेलों का दौरा कर चुके हैं। जेल जाने से डरने के सवाल पर जस्टिस कर्णन ने कहा, “मैं नेपोलियन की तरह हूं, डॉक्टर अंबेडकर का एक दत्तक पुत्र….वो कहते हैं मैं पागल हूं। अगर मैं पागल हूं तो मुझे जेल क्यों भेजा जा रहा है?”

ये पूछने पर की क्या वो राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी से मिलने वाले हैं? जस्टिस कर्णन ने कहा कि वो पहले राष्ट्रपति को अपना प्रतिनिधित्व भेज चुके हैं। जस्टिस कर्णन ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट का आदेश लागू होने लायक नहीं है और वो मीडिया पर प्रतिबंध के सर्वोच्च अदालत के आदेश को खारिज करने वाला आदेश दे चुके हैं। जस्टिस कर्णन ने कहा कि ये मामला सुप्रीम कोर्ट के सात जजों और उनके बीच का नहीं बल्कि न्यायापालिका में भ्रष्टाचार का है जिसकी अनदेखी की जा रही है। जस्टिस कर्णन ने कहा कि एटार्नी जनरल मुकुल रोहतगी ने सर्वोच्च अदालत में मामले को सही तरीके से नहीं रखा।

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