Friday, April 19, 2024
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अनूप जलोटा: सुनने से ज्यादा जरूरी है भजन को समझना

SI News Today

‘ऐसी लागी लगन….जग में सुंदर हैं दो नाम….मैया मोरी मैं नहीं माखन खायो…समेत सैकड़ों ऐसे भजन हैं, जिनको सुनते ही भजन सम्राट अनूप जलोटा की छवि आंखों के सामने आने लगती है। अपनी मखमली आवाज और चुनिंदा भजनों के जरिए भजन गायन को एक मुकाम तक पहुंचाने वाले अनूप का मानना है कि केवल भजन सुनने से कुछ नहीं होगा। भजन के अर्थ को समझना और जीवन में उतारना जरूरी है। बीते दिनों कोलकाता शहर में कार्यक्रम पेश करने आए अनूप जलोटा से जनसत्ता ने बातचीत की…

सवाल : सरगम यानी संगीत की तरफ रूझान कैसे हुआ?
’संगीत की तरफ रूझान पारिवारिक माहौल की वजह से हुआ। मेरे पिता पुरुषोत्तमदास जलोटा प्रसिद्ध शास्त्रीय गायक थे। सच कहूं तो पिताजी की वजह से ही मैं गायन क्षेत्र में आया और श्रोताओं के प्यार से आज यह मुकाम मिला।
सवाल : आपने भजन ही क्यों चुना ?
’देखिए, मैंने शुरुआत शास्त्रीय संगीत से की थी। मुझे ऐसा लगा कि लोग मेरे गाए भजनों को अधिक पसंद कर रहे हैं, लिहाजा मैंने भजन शैली को ही अपना लिया। दूसरी बात यह कि गाने व गजल की तुलना में भजन गाने से एक अलग तरह की संतुष्टि होती है।
सवाल : परदे के पीछे गाना सहज है या मंच पर?
’दोनों कठिन हैं। पार्श्व गायन और मंच गायन, जिसको जो रास आ जाए, उसके लिए वही अच्छा है।
सवाल : एक अच्छा गायक बनने के लिए क्या-क्या जरूरी है?
’सबसे पहले ईश्वर की कृपा जरूरी है। नियमित रियाज और गायन के प्रति समर्पण भी भूमिका निभाता है। प्रसिद्धी दिलाने में शास्त्रीय संगीत का ज्ञान अहम होता है। इसकी बदौलत गायक इस न केवल जल्दी स्थापित होते हैं, बल्कि देर तक टिके भी रहते हैं।
सवाल : कहां कार्यक्रम पेश कर आपको सबसे ज्यादा खुशी हुई और कहां दुख हुआ?
’ सबसे ज्यादा आनंद बंगाल में गाकर आता है, क्योंकि यहां घर-घर में संगीत सीखा जाता है। संगीत की साधना होती है। इसके बाद नंबर महाराष्ट्र का आता है। दक्षिण भारत के कुछ शहरों में जाकर दुख होता है, क्योंकि वहां के लोग या तो हिंदी समझते नहीं या कुछ लोग समझते भी हैं तो दर्शाते नहीं।
सवाल : खाली वक्त में आप क्या सुनते और क्या पढ़ते हैं?
’ खाली वक्त में समाचार पढ़ता हूं। फिल्में देखता हूं। सावधान इंडिया और सीआईडी मेरे पसंदीदा कार्यक्रम हैं। कुछ पुस्तकें पढ़ता हूं। संतों की वाणी सुनता हूं।
सवाल : घंटे भर एकांत में केवल सुनना है, तो क्या और किसे सुनना पसंद करेंगे?
’अपने पिता की रिकार्डिंग सुनना पसंद करूंगा, क्योंकि उन्हीं से मैंने सीखा है और जब भी सुनता हूं कुछ ना कुछ नया सीखने को मिलता है।
सवाल :आपके पसंदीदा गायक?
’ अलग-अलग क्षेत्र में अलग-अलग गायक हैं। फिल्मों में मोहम्मद रफी, मन्ना डे, किशोर कुमार। गजल में बेगम अख्तर, मेहदी हसन, जगजीत सिंह, गुलाम अली। क्लासिकल में पंडित भीमसेन जोशी, पंडित जसराज।
सवाल : संगीत यानी भजन के जरिए क्या संदेश देना चाहते हैं?
’यही संदेश देना चाहता हूं कि भजन से जो शिक्षा दी जाती है उसे जीवन में उतारें। केवल भजन सुनने से कुछ नहीं होगा। भजनों के शब्दों का मनन करना होगा, तभी भजन सुनना सार्थक होगा।
सवाल : मौजूदा वक्त में पुराने गीतों को नए तरीके से पेश किया जा रहा है, क्या कहेंगे?
’ यह अच्छी विधा है। इससे पुराने गीत फिर जुबां पर आ जाते हैं, लेकिन धुन से छेड़छाड़ ठीक नहीं है।

सवाल- पुराने गानों और आज के गानों में जमीन-आसमान का अंतर है ऐसा क्यों?
जवाब- इसकी मुख्य वजह है कि पहले गाने फिल्म की कहानी पर आधारित होते थे और उनके शब्दों का अर्थ होता था, लेकिन आज के गानों में वह बात नहीं है। इसलिए पुराने गीत आज भी जीवित हैं।
सवाल : सरगम यानी संगीत की तरफ रूझान कैसे हुआ?
’संगीत की तरफ रूझान पारिवारिक माहौल की वजह से हुआ। मेरे पिता पुरुषोत्तमदास जलोटा प्रसिद्ध शास्त्रीय गायक थे। सच कहूं तो पिताजी की वजह से ही मैं गायन क्षेत्र में आया और श्रोताओं के प्यार से आज यह मुकाम मिला।
सवाल : आपने भजन ही क्यों चुना ?
’देखिए, मैंने शुरुआत शास्त्रीय संगीत से की थी। मुझे ऐसा लगा कि लोग मेरे गाए भजनों को अधिक पसंद कर रहे हैं, लिहाजा मैंने भजन शैली को ही अपना लिया। दूसरी बात यह कि गाने व गजल की तुलना में भजन गाने से एक अलग तरह की संतुष्टि होती है।
सवाल : परदे के पीछे गाना सहज है या मंच पर?
’दोनों कठिन हैं। पार्श्व गायन और मंच गायन, जिसको जो रास आ जाए, उसके लिए वही अच्छा है।
सवाल : एक अच्छा गायक बनने के लिए क्या-क्या जरूरी है?
’सबसे पहले ईश्वर की कृपा जरूरी है। नियमित रियाज और गायन के प्रति समर्पण भी भूमिका निभाता है। प्रसिद्धी दिलाने में शास्त्रीय संगीत का ज्ञान अहम होता है। इसकी बदौलत गायक इस न केवल जल्दी स्थापित होते हैं, बल्कि देर तक टिके भी रहते हैं।
सवाल : कहां कार्यक्रम पेश कर आपको सबसे ज्यादा खुशी हुई और कहां दुख हुआ?
’ सबसे ज्यादा आनंद बंगाल में गाकर आता है, क्योंकि यहां घर-घर में संगीत सीखा जाता है। संगीत की साधना होती है। इसके बाद नंबर महाराष्ट्र का आता है। दक्षिण भारत के कुछ शहरों में जाकर दुख होता है, क्योंकि वहां के लोग या तो हिंदी समझते नहीं या कुछ लोग समझते भी हैं तो दर्शाते नहीं।
सवाल : खाली वक्त में आप क्या सुनते और क्या पढ़ते हैं?
’ खाली वक्त में समाचार पढ़ता हूं। फिल्में देखता हूं। सावधान इंडिया और सीआईडी मेरे पसंदीदा कार्यक्रम हैं। कुछ पुस्तकें पढ़ता हूं। संतों की वाणी सुनता हूं।
सवाल : घंटे भर एकांत में केवल सुनना है, तो क्या और किसे सुनना पसंद करेंगे?
’अपने पिता की रिकार्डिंग सुनना पसंद करूंगा, क्योंकि उन्हीं से मैंने सीखा है और जब भी सुनता हूं कुछ ना कुछ नया सीखने को मिलता है।
सवाल :आपके पसंदीदा गायक?
’ अलग-अलग क्षेत्र में अलग-अलग गायक हैं। फिल्मों में मोहम्मद रफी, मन्ना डे, किशोर कुमार। गजल में बेगम अख्तर, मेहदी हसन, जगजीत सिंह, गुलाम अली। क्लासिकल में पंडित भीमसेन जोशी, पंडित जसराज।
सवाल : संगीत यानी भजन के जरिए क्या संदेश देना चाहते हैं?
’यही संदेश देना चाहता हूं कि भजन से जो शिक्षा दी जाती है उसे जीवन में उतारें। केवल भजन सुनने से कुछ नहीं होगा। भजनों के शब्दों का मनन करना होगा, तभी भजन सुनना सार्थक होगा।
सवाल : मौजूदा वक्त में पुराने गीतों को नए तरीके से पेश किया जा रहा है, क्या कहेंगे?
’ यह अच्छी विधा है। इससे पुराने गीत फिर जुबां पर आ जाते हैं, लेकिन धुन से छेड़छाड़ ठीक नहीं है।

सवाल- पुराने गानों और आज के गानों में जमीन-आसमान का अंतर है ऐसा क्यों?
जवाब- इसकी मुख्य वजह है कि पहले गाने फिल्म की कहानी पर आधारित होते थे और उनके शब्दों का अर्थ होता था, लेकिन आज के गानों में वह बात नहीं है। इसलिए पुराने गीत आज भी जीवित हैं।

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