Monday, March 4, 2024
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टीबी: सिर्फ 1 घंटे में लगेगा बीमारी का पता

SI News Today

इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ टेक्नॉलजी (आईआईटी) अब टीबी की बीमारी का पता लगाने के लिए एक किफायती सिस्टम लेकर आ रही है। इससे कम कीमत पर जल्द से जल्द बीमारी का पता लग सकेगा। इस सिस्टम से टूबर माइकोबैक्टिरियम टुबर्क्यलोसिस का पता लगाया जा सकेगा, जो बीमारी पैदा करने वाले बैक्टीरिया की प्रजाति है।
यह बैक्टीरिया टीबी की बीमारी पैदा करने वाला एजेंट है। आईआईटी दिल्ली की टीम का सिस्टम सिर्फ 60 मिनट में टीबी का पता लगा लेगा। साथ ही यह फील्ड फ्रेंडली है। इसका मतलब है कि इस किट को कहीं भी आसानी से ले जाया जा सकता है। यह सिस्टम टीबी के उस टाइप का पता लगाएगा, जिसकी पहचान नहीं की जा सकती।

इस सिस्टम को लेकर जल्द ही पूरे देश में आईआईटी दिल्ली क्लिनिकल टेस्ट करेगी।
टीबी को लेकर आईआईटी की रिसर्च को कामयाबी मिली है। आईआईटी के बायोटेक्नॉलजी डिपार्टमेंट, इंस्टिट्यूट के ही कुसुमा स्कूल ऑफ बायलॉजिकल साइंसेज ने नैशनल इंस्टिट्यूट ऑफ पैथॉलजी, इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च के साथ मिलकर यह रिसर्च की है।
प्रॉजेक्ट के प्रिंसिपल इंवेस्टिगेटर प्रो रविकृष्ण इलानगोवान ने बताया कि दुनिया में हर साल 1.5 लाख मौतें टीबी से होती हैं। इस बीमारी का सेंसटिव तरीके से पता लगाने के लिए नए सिस्टम लाना बहुत जरूरी है, ताकि जल्दी इलाज शुरू हो सके। टीबी के कई टाइप की पहचान अभी मुश्किल है। इसकी वजह से अब भी कई मरीजों की मौत तक हो जाती है।

दरअसल, टीबी की पहचान बलगम के सैंपल में माइकोबैक्टीरियम का पता लगाकर किया जाता है। सैंपल की जांच का सबसे कॉमन तरीका है स्मीर माइक्रोस्कोपी, जिसमें माइक्रोस्कोप से सैंपल की जांच की जाती है। मगर यह टेस्ट कई बारीकियों का पता नहीं लगा पाता। रिसर्चर्स का कहना है कि अब टीम ने कम कीमत पर सेंसिटिव टेस्ट पर काम करना शुरू किया।

आईआईटी के बायॉटेक्नॉलजी डिपार्टमेंट के प्रो रविकृष्ण ने बताया कि यह किट पोर्टेबल और ऑटोमेटिक होगा। इसे फील्ड में भी ले जाया जा सकेगा। यह रैपिड माइक्रोबैक्टीरियम टुबर्क्यलोसिस (एमटीबी) टेस्ट करेगा। हर एक सैंपल के लिए सिर्फ 60 मिनट का वक्त लेगा। इसकी कीमत 300 से 400 रुपये के बीच ही होगी। इसकी पैकिंग भी इस तरह की होगी कि एक्सपोजर में यह खराब न हो।

इस सिस्टम को लेकर जल्द ही पूरे देश में आईआईटी दिल्ली सौ क्लिनिकल टेस्ट करेगा, ताकि डिवाइस का टेस्ट को सके। इसके बाद बड़े स्केल पर क्लिनिकल टेस्ट शुरू होंगे। यह प्रॉजेक्ट एचआरडी मिनिस्ट्री के ‘इम्प्रिंट’ का हिस्सा है, जो साइंस और इंजिनियरिंग के प्रॉजेक्ट पर फोकस कर रहा है।

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