Saturday, May 25, 2024
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!!विकास की आंधी में उड़ती जुम्मन की झोपड़ी!!

SI News Today

आज़ाद भारत,विकास का भूखा भारत। सत्तर साल से लगातार विकास के पथ पर उठता गिरता संभालता भारत। विकास का सीधा सम्बन्ध आधारिक सरंचना से माना गया।दिल्ली और नोयडा जैसे इलाकों में कंकरीट रुपी जंगल विकास पर परचम लहराने लगा। जीतनी ऊंची इमारत उतना विकसित शहर।मिश्रा जी अपना स्कूटर लेकर सड़क किनारे जुम्मन की दूकान पर खड़े अखबार पढ़ते हुए और खुश होकर खबर जुम्मन को बताते हुए की गोंडा से बलरामपुर फोर लेन की सड़क पास हो गयी है और कल से अतिक्रमण और अवैध कब्जा हटाया जायेगा।मिश्रा जी तो इतना बता कर चलते बने जुम्मन का घर और दूकान दोनों ही अतिक्रमण की जद में आ गयी प्रसाशन ने उसका घर चिन्हित भी कर दिया। अब बात यह है की इस विकास से फायदा तो बहुत है और विकास आवश्यक भी है लेकिन जुम्मन का क्या?माना की ऐसे गरीब लोगों के लिए संविधान में कई नियम और कई समितियां गठित करने का प्रावधान हैं।लेकिन जुम्मन ने तो अपराध किया क्यूँ अवैध कब्जे पर अपना परिवार बसा कर बैठ गया,अब जुम्मन को कभी प्रसाशन ने रोका भी नहीं की सरकारी जमीन पर अपने परिवार के साथ तुम्हारा रहना शहर को कुरूप बना रहा है।और अगर प्रसाशन रोकता भी तो जुम्मन के हिमायती नेता जो फिलहाल नदारद हैं जुम्मन की तरफदारी कर उसको बरगलाते रहते। पूरे भारत में इस तरह के कई अवैध कब्जे जिनको हटाया जाना अति आवश्यक है।कई जगह पर सरकार मुवावजे के रूप में राहत तो देती है लेकिन मुवावजे तो बड़े शोपिंग काम्प्लेक्स और पक्के निर्मित घर को मिलते हैं जुम्मन की घास फूस की झोपड़ी का क्या मोल और जुम्मन के पंचर की दूकान भी तो सरकारी खातों में रजिस्टर्ड नहीं हैं। ऐसे जुम्म्नो के लिए अदम गोंडवी की चार लाइनें याद आती हैं-
खेत जो सीलिंग के थे सब चक में शामिल हो गए,
हम को पट्टे की सनद मिलती भी है तो ताल में।।
मतलब अगर जुम्मन के हक़ की बात सरकार करे भी,तो जो घाघ बाबू हैं वो तो जुम्मन का हक़ किसी और को दे चुके हैं ।कहने पढने को तो संविधान में एक आम आदमी के संविधानिक रक्षा के लिए अनुछेद 32 की तरह कई प्रावधान मौजूद हैं लेकिन ये उनके लिए है जो जुगाडू वकील के संपर्क में हो या फिर जिन पर मीडिया का आशीर्वाद प्राप्त हो जाये। विकास का एक मुद्दा सरकार की सुलभता भी होनी चाहिए। नहीं तो ऐसे कई जुम्मन हैं जिनकी गिनती केवल जनगणना में होती है। रेलवे फाटक बंद होते लगती गाड़ियों की भीड़ के बीच भुट्टे और चना बेचने वालों का तब क्या होगा जब वहां पर फ्लाईओवर बन कर तैयार हो जायेगा।और उस व्यक्ति के लिए क्या जिसने सरकार द्वारा निर्मित समतल जमीन से 3 फुट धसी सड़क के बगल अपना घर बनाया और कल सरकार की नयी नीतियों में उस सड़क को 12 फुट ऊपर कर दिया गया अब उस व्यक्ति के घर के दृश्य का क्या।क्यूँ सरकार अपनी नीतियों में दूरदर्शिता नहीं लाती है।इसी दूरदर्शिता की कमी आज नक्सल की समस्या रुपी आग में पेट्रोल डालने का काम कर रही है।जिला गोंडा में 2012 में अतिक्रमण ने जोर पकड़ा कई किलोमीटर तक अवैध कब्जों वाली दुकाने हटाई गयीं तभी उसी के बाद से शहर में अचानक चैन छिनने और मोटरसाईकिल चोरी जैसी घटनाओं में इजाफा हुआ।आज से 50 साल पहले इसी विकास की लहर से नक्सलवाद जैसी समस्या ने जन्म लिया।अतिक्रमण में तो बड़े व्यापारी भी आतें हैं। लेकिन उनको कोर्ट कचेहरी जाने का मौक़ा भी मिलता है,और कभी कभार राहत या समय भी मिल जाता है। लेकिन जुम्मन का क्या इनके लिए तो फैसला ओन द स्पॉट।अब जुम्मन के लिए बोलने और लिखने की हिम्मत भी नहीं होती,नहीं तो लोग आपको जाहिल और पिछड़ी मानसिकता वाला बतायेंगे। खैर विकास तो मुझे भी चाहिए लेकिन जुम्मन की आँखों में जो विकास से मिले दर्द का आंसू है उनको कौन पोछेगा???

SI News Today
Pushpendra Pratap singh

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