Friday, April 19, 2024
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कैप्टन शफीक मेरे थे, हैं और हमेशा रहेंगे-

SI News Today

शहीद कैप्टन शफीक घोरी की पत्नी सलमा शफीक घोरी ने अपने पति की सोलहवीं पुण्यतिथि पर एक ऐसा फेसबुक पोस्ट लिखा कि वह सबको झकझोर कर रख देगा। शफीक घोरी 1 जुलाई 2001 को जम्मू कश्मीर में आतंकियों के साथ हुई मुठभेड़ में शहीद हो गए थे। उस समय वह ऑपरेशन रक्षक में थे। सलमा शफीक घोरी ने फेसबुक पोस्ट में लिखा कि मैं 19 साल की थी जब कैप्टन शफीक से 1991 में मेरी शादी हुई थी। शुरुआत में दिक्कत हुई, वह मुझे लंबे समय के लिए अकेला छोड़कर ड्यूटी पर चले गए। फिर एक बार उन्होंने मुझे एक आर्मी वाले की पत्नी होने का मतलब समझाया। तब कोई मोबाइल फोन नहीं थे। तब ड्यूटी पर जल्दी फोन भी नहीं मिलते थे। हम दोनों एक दूसरे को पत्र लिखते थे। मुझे उनका रोजाना एक पत्र जरूर मिलता था। मैं उनके सामान के बैग में छोटे छोटे सरप्राइज छुपा देती थी। कुछ समय बाद उनकी पोस्टिंग हाई रिस्क एरिया में हो गई, लेकिन मैं अब पहले से ज्यादा मजबूत हो गई थी।

एक फौजी की पत्नी की जिम्मेदारियां क्या होती हैं इसका मुझे अहसास हो गया था। मैं जानती थी कि कैप्टन शफीक सबसे पहले अपने देश को प्यार करते हैं फिर दूसरे नंबर पर उनका परिवार आता है। मुझे उनका आखिरी खत तब मिला, जब मुझे पता चला कि शफीक देश की खातिर न्यौछावर हो गए हैं। 28 जून 2001 को फोन पर हमारी आखिरी बार बात हुई थी। सफीक ने परिवार का हाल चाल पूछा और बताया कि वह जंगल में एक मिलिट्री ऑपरेशन पर हैं।

21 जुलाई 2001 को शाम 6.30 बजे कुछ आर्मी ऑफिसर्स और उनकी पत्नियां मेरे पास पहुंची। उनमें से एक महिला ने मुझे बैठने के लिए कहा और बताया कि कैप्टन शफीक अब नहीं रहे, मुझे लगा कि मैंने गलत सुना। यह जरूर कोई गलती हुई है। एक आर्मी ऑफिसर की पत्नी ने कहा कि हम लोग सुबह से तुमसे कॉन्टेक्ट करने की कोशिश करे थे लेकिन फोन पर बात नहीं हो पाई। उसी दिन ही शफीक का आखिरी खत भी मुझे मिला था। अगले दिन मैं एयरपोर्ट पर कैप्टन शफीक का पार्थिव शरीर लेने पहुंची तो तिरंगे में लिपटा शव देखकर टूट गई। कैप्टन हमेशा कहते थे कि तुम मजबूत बनी रहना। यह बात उन्होंने तब भी कही थी जब आखिरी बार हमारी बात हुई थी।

सेना के अधिकारियों ने कैप्टन की यूनिफार्म और दूसरे कपड़ों का बॉक्स मुझे दे दिया। आठ साल तक मैंने उनके किसी भी कपड़े को नहीं धोया था। मुझे इतने सालों में कभी नहीं लगा कि कैप्टन शफीक मेरे साथ नहीं हैं। उनके पैसे वैसे ही उनके वॉलेट में रखे हैं। उनके भेजे हुए सारे खत मेरी जिंदगी का हिस्सा हैं। अब मैं मां ही नहीं पिता का भी फर्ज निभाती हूं। कैप्टन शफीक के जाने के बाद लोगों ने मुझे आगे बढ़ने की सलाह दी। लेकिन मैंने शफीक के लिए जीने की ठान ली। मैं शहीद फौजियों के परिवार के कल्याण और महिला सशक्तिकरण के लिए कर्नाटक में काम करती हूं। कैप्टन शफीक मेरे थे, हैं और हमेशा मेरे ही रहेंगे। इस पोस्ट को BeingYou नाम के फेसबुक पेज पर शेयर किया गया है। एक जुलाई से लेकर अब तक इसे करीब दो लाख लोग लाइक कर चुके हैं। वहीं 22 हजार से ज्यादा लोग इसपर कमेंट कर चुके हैं। करीब 45 हजार लोग इस पोस्ट को शेयर कर चुके हैं।

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