Sunday, April 21, 2024
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पहले दिया अरावली पर्वत को ‘नंगा’ कर देने वाला ऑर्डर

SI News Today

हरियाणा सरकार ने शुक्रवार (19 मई) को एक ऐसा आदेश दिया जिससे अरावली पहाड़ी पर शायद एक भी पेड़ ना बचता। हरियाणा वन विभाग के उस ऑर्डर के मुताबिक कीकर और मस्कट नाम की प्रमुख पेड़ प्रजातियों को पंजाब जमीन बचाव एक्ट 1990 से बाहर कर दिया गया था। उस एक्ट के अंदर आने वाले पेड़ों को काटना और जलाने पर पाबंदी है। लेकिन बाद में जब हंगामा हुआ तो इंडियन एक्सप्रेस से बात करते हुए जंगल के प्रधान मुख्य संरक्षक (PCCF) डॉ भोजावैद ने कहा कि वह ऑर्डर एक ‘गलती’ थी। वहीं मामले पर सफाई देते हुए वन और वन्यजीव के मुख्य सहायक सचिव एस के गुलाटी ने कहा कि पेड़ों को एक्ट से बाहर नहीं किया गया था बल्कि उस उनको कम रिस्क वाली केटेगरी में डाल दिया गया था ताकि व्यापार को बढ़ावा मिल सके। गुलाटी ने आगे कहा, ‘PCCF द्वारा जारी शुरुआती ऑर्डर गलती से दिया गया था, उसे वापस ले लिया गया है। सरकार ने कोई नोटिफिकेशन भी जारी नहीं किया है।’

सूत्रों के मिली जानकारी के मुताबिक, वन विभाग के अधिकारियों ने ही दोनों पेड़ों को लिस्ट के बाहर रखने पर विरोध जताया था। एक अधिकारी ने बताया कि अगर दोनों पेड़ों को लिस्ट के बाहर कर दिया जाता तो बिल्डर, खनन माफिया इसका फायदा उठाते। ‘सेव अरावली’ नाम से आंदोलन चला रहे लोगों ने ऑर्डर के पीछे ‘साजिश’ बताई। उन लोगों का कहना है कि अरावली पर मौजूद पेड़ों में से 90 प्रतिशत पेड़ कीकर और मस्कट के ही हैं।

फिलहाल सात कृषि-वन प्रजातिया ऐसी हैं जिनको लिस्ट से बाहर रखा गया है। यानी उनको काटने-जलाने पर पाबंदी नहीं है। इसमें नीलगिरी, पोपलार, बकेन, बांस, तूट, अम्रोद और ऐलांथस शामिल हैं। मस्कट विदेशी प्रजातियां में से एक है। माना जाता है कि इसको 1870 के करीब मेक्सिको से लाया गया था वहीं कीकर भारतीय द्वीप का ही है।

अरावली पहाड़ी को भारत की सबसे बड़ी पहाड़ियों में से एक माना जाता है। यह हरियाणा में लाखों एकड़ के साथ-साथ गुरुग्राम, फरीदाबाद, भिवानी, रेवाड़ी और मेहेंद्रगढ़ जिले तक फैली हुई है। कहा जाता है कि इसकी काफी जमीन पहले ही बिल्डर, राजनेता और नौकरशाह खरीद चुके हैं।

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