Saturday, May 25, 2024
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महात्‍मा गांधी की हत्‍या से ज्‍यादा गंभीर अपराध्‍ा है बाबरी मस्जिद गिराना -: असदुद्दीन ओवैसी

SI News Today

आल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (एआईएमआईएम) के अध्यक्ष असदुद्दीन ओवैसी कथित तौर पर बाबरी मस्जिद गिराए जाने को महात्मा गांधी की हत्या से “ज्यादा गंभीर” अपराध बताकर विवादों से घिर गये हैं। बुधवार (19 अप्रैल) को सुप्रीम कोर्ट ने बाबरी मस्जिद गिराए जाने के मामले में भाजपा नेताओं लाल कृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी और उमा भारती पर आपराधिक साजिश का मामला चलाने का आदेश दिया। अदालत के फैसले के बाद ओवैसी के नाम से चलाए जाने वाले ट्विटर अकाउंट से इस मसले पर कई ट्वीट किए गये जो मीडिया में छाये रहे। ओवैसी का अकाउंट ट्विटर द्वारा प्रमाणित अकाउंट नहीं है।
असदुद्दीन ओवैसी के इस अकाउंट से ट्वीट में कहा गया है, “महात्मा गांधी की हत्या का सुनवाई दो साल में पुरी हो गयी थी और बाबरी मस्जिद गिराये जाने के मामले में अभी तक फैसला नहीं आया है जो कि उससे ( महात्मा गांधी की हत्या से) गंभीर अपराध है।” एक अन्य ट्वीट में लिखा गया है, “गांधी के हत्यारों को सजा और फांसी हुई लेकिन बाबरी के आरोपियों को केंद्रीय मंत्री बनाया गया, पद्म विभूषण दिया गया, न्याय की रफ्तार धीमी है।” एक अन्य ट्वीट में कहा गया, “ये शर्म की बात है कि 1992 के जिम्मेदार देश चला रहे हैं।”
सुप्रीम कोर्ट ने आडवाणी, जोशी और भारती समेत 13 अभियुक्तों पर छह दिसंबर 1992 में अयोध्या स्थित बाबरी मस्जिद गिराने की आपराधिक साजिश के आरोप में मुकदमा चलाने का आदेश देते हुए राजस्थान के राज्यपाल कल्याण सिंह पर ये फैसला न लागू होने की बात साफ की थी। अदालत ने कहा कि सिंह पर राज्यपाल रहते हुए मुकदमा नहीं चल सकता। सिंह 1992 में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री थे। बाबरी मस्जिद मामले में वो आरोपी बनाए गये थे।

ओवैसी ने मांग की है कि कल्याण सिंह को राज्यपाल पद छोड़कर अदालती कार्रवाई का सामना करना चाहिए। एक ट्वीट में कहा गया, “क्या कल्याण सिंह इस्तीफा देंगे और मुकदमे का सामना करेंगे या राज्यपाल पद के पीछे छिपे रहेंगे। क्या मोदी सरकार न्यायहित में उन्हें पद से हटाएगी? मुझे तो शक है। ”
इस अकाउंट से किए गए ट्वीट में सुप्रीम कोर्ट को भी नहीं बख्शा गया है। एक ट्वीट में इशारा किया गया है कि अगर सुप्रीम कोर्ट ने अयोध्या में कारसेवा की इजाजत न दी होती तो ये न होता। यूपी सरकार के इस आश्वासन के बाद की सबकुछ शांतिपूर्ण होगा सुप्रीम कोर्ट ने 28 नवंबर 1992 को प्रतीकात्मक कारसेवा का आदेश दिया था। कुछ दिन बाद छह दिसंबर को 16वीं सदी की मस्जिद कारसेवकों द्वारा गिरा दी गयी।

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