Friday, March 1, 2024
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दलाई लामा से बोली चीन सरकार, कहा-

SI News Today

चीन ने शुक्रवार को कहा कि दलाई लामा को अपना उत्तराधिकारी नियुक्त करने के लिए चीन सरकार द्वारा तय रिवाजों तथा प्रक्रियाओं को बदलने का कोई अधिकारी नहीं है।
चीन के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने लु कांग ने संवाददाता सम्मेलन में कहा, “दलाई लामा की उपाधि केंद्र सरकार द्वारा दी जाती है। इसके लिए धार्मिक रिवाज व प्रक्रियाएं तय हैं, जिसे किसी के द्वारा नहीं बदला जा सकता। लु ने कहा, जहां तक नए दलाई लामा की बात है, तो सरकार के सक्षम विभागों ने इसपर बात की है और उसने एक श्वेतपत्र भी जारी किया है। 14वें दलाईलामा को इस बारे में अच्छे से पता है। उल्लेखनीय है कि चीन 14वें दलाई लामा को अलगाववादी मानता है, जो तिब्बत में स्वायत्तता की मांग कर रहे हैं। तिब्बत के आध्यात्मिक नेता सन् 1959 में तिब्बत से भागकर भारत चले गए थे और तब से वहीं रह रहे हैं।

हाल ही दलाई लामा ने स्वयं को ‘भारत का सपूत’ बताते हुए कहा कि भारत ‘गुरू’ है और लोग इसके चेले हैं। 81 वर्षीय नोबेल पुरस्कार विजेता ने खुद को भारतीय मूल्यों और ज्ञान का दूत भी कहा। पिछले महीने उनकी अरुणाचल प्रदेश की यात्रा पर चीन ने नाराजगी प्रकट की थी। दलाई लामा ने यहां ‘सामाजिक न्याय और डॉ बी आर अंबेडकर’ विषय पर राज्यस्तरीय सेमिनार को संबोधित करते हुए कहा कि सामाजिक न्याय का अभाव जाति के नाम पर होता है, धर्म के नाम पर नहीं। लेकिन यह सामंती व्यवस्था जैसी मौजूदा सामाजिक व्यवस्थाओं के चलते है।

उन्होंने कहा, ‘‘भारत गुरू है और हम चेले हैं। हम विश्वसनीय चेले हैं क्योंकि हमने आपके प्राचीन ज्ञान को सहेज रखा है। उन्होंने कहा, ‘‘मैं खुद को भारत का सपूत भी मानता हूं क्योंकि मेरे मस्तिष्क की हर कोशिका प्राचीन भारतीय ज्ञान से भरी हुई है और मेरा शरीर भारतीय दाल और चावल से चलता है। तिब्बती आध्यात्मिक नेता 1959 से भारत में रह रहे हैं। उन्होंने तिब्बत की राजधानी ल्हासा से 15 दिन तक पैदल चलकर भारत की सीमा में प्रवेश किया था।

दलाई लामा ने कहा कि सांस्कृतिक रूप से यह नकारात्मक पहलू हमारे समाज में विद्यमान है जिसे समाप्त किया जाना चाहिए। धर्म और धार्मिक व्यवस्थाओं के नाम पर कुछ सामंती प्रथाएं हैं जो नहीं होनी चाहिए। उन्होंने कहा कि शिक्षा के माध्यम से जाति से संबंधित अन्याय को समाप्त किया जा सकता है। समाज के कुछ वर्गों में मौजूद असुरक्षा की भावना को शिक्षा के माध्यम से समाप्त किया जाना चाहिए।
दलाई लामा ने कहा, ‘‘जिससे समानता की भावना आए, जिससे आत्मविश्वास का निर्माण हो। आत्मविश्वास, कड़े परिश्रम और शिक्षा से समानता को हासिल किया जा सकता है।

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