Thursday, June 20, 2024
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वक्त की नब्ज- हकीकत के बजाय हंगामा

SI News Today

तीन साल पहले इसी हफ्ते नरेंद्र मोदी के शपथग्रहण समारोह के फौरन बाद जाने-माने राजनीतिक पंडितों के लिखे लंबे-लंबे लेख छपे थे देश भर के अखबारों में, जिनका एक ही संदेश था: भारत अब भारत नहीं रहेगा। अपने देश के ज्यादातर राजनीतिक पंडित सेक्युलर मिजाज के हैं, सो उनको यकीन था कि नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद भारत में हिंदू-मुसलिम दंगे फैल जाएंगे और धीरे-धीरे भाईचारा इस हद तक खत्म हो जाएगा कि भारत में दुबारा बंटवारे की नौबत आ सकती है। ऐसा नहीं हुआ बावजूद महीनों लंबे इस प्रचार के कि ईसाइयों को डराने के लिए गिरजाघरों में हमले कराए जा रहे हैं और घर वापसी की मुहिम इसी सिलसिले की एक कड़ी है।  इसके बाद चला पुरस्कार वापसी का आंदोलन, मोहम्मद अखलाक की हत्या को लेकर, जिसमें भारत के सौ से ज्यादा लेखकों और बुद्धिजीवियों ने अपने सरकारी अवार्ड वापस किए थे। वह दौर भी गुजर गया, लेकिन आज भी रोमिला थापर जैसे इतिहासकार कहते फिर रहे हैं कि देश का माहौल इतना बिगड़ गया है कि पत्रकार भी पत्रकार नहीं रहे हैं। हाल में दिए एक इंटरव्यू में रोमिलाजी ने कहा कि, ‘ऐसा लगता है कि पत्रकारिता के बहाने एक विचारधारा का प्रचार हो रहा है।’

उधर अरुण शौरी जैसे पूर्व मंत्री हैं, जो कहते हैं अपने हर इंटरव्यू में कि अघोषित इमरजंसी लग गई है देश में, जो इंदिरा गांधी की इमरजंसी से ज्यादा भयानक है, क्योंकि वह पुरानी इमरजंसी कानून के दायरे में थी और अब जो हो रहा है वह कानून के दायरे के बाहर है। यानी लोगों में भय फैलाने का काम गुंडों को सौंप दिया है गोरक्षा के बहाने। माना कि गोरक्षा के नाम पर जो हो रहा है, वह बहुत गलत है, लेकिन ऐसी बातें जब सुनती हूं तो याद आते हैं मुझे ऐसे गुजरे दौर, जब वास्तव में लगता था कि भारत बर्बाद होने वाला है। आॅपरेशन ब्लूस्टार के बाद पंजाब का हाल इतना खराब था कि लगता था, खालिस्तान बन कर रहेगा। इंदिराजी की हत्या के बाद लगा कि सिखों और हिंदुओं में भाईचारा कभी वापस नहीं आएगा। रही बात कश्मीर की, वहां ऐसे दौर गुजरे हैं कई बार कि कभी-कभी यकीन करना मुश्किल होता है कि कश्मीर घाटी अब भी भारत में है। इन पुरानी यादों से जब मन भर जाता है तो लगता है कि पिछले तीन सालों में शांति ही शांति रही है। लेकिन नरेंद्र मोदी अब भी इतने बदनाम हैं कि हाल में न्यूयॉर्क टाइम्स की एलेन बेरी ने ट्वीट करके कहा कि मोदी के नेतृत्व में 2002 के गुजरात दंगे ऐसे थे, जो 1947 के बाद पहली बार हुए थे भारत में।

मोदी अगर बदनाम हैं आज भी तो कुछ दोष ‘सेक्युलर’ पत्रकार बंधुओं का तो है, पर कुछ दोष उनका भी है। मीडिया से इतनी दूर रहे हैं वे प्रधानमंत्री बनने के बाद कि डोनल्ड टंÑप ने पिछले छह महीनों में मोदी से ज्यादा इंटरव्यू दिए हैं और मोदी से ज्यादा मिले हैं पत्रकारों से प्रेस कॉन्फ्रेंस द्वारा, बावजूद इसके कि मीडिया से नफरत करते हैं टंÑप। फेक न्यूज या झूठे समाचार फैलाने का आरोप टंÑप ने लगाया है मीडिया पर, लेकिन फिर भी पत्रकारों से मिलते रहते हैं। मोदी इतना कम मिले हैं पत्रकारों से कि पिछले तीन वर्षों में उनकी तरफ से एक भी प्रेस कॉन्फ्रेंस नहीं बुलाई गई है। इससे नुकसान पत्रकारों का कम और प्रधानमंत्री का ज्यादा हुआ है। उनकी सरकार की उपलब्धियों का जिक्र कम हुआ है पिछले तीन सालों में और गोरक्षकों की हिंसा और हिंसक हिंदुत्व का कहीं ज्यादा। सो, दुनिया जानती ही नहीं कि स्वच्छ भारत योजना का कितना गहरा असर पड़ा है देश में, खासकर देहातों में। यह भी बहुत कम लोग जानते हैं कि मोदी राज में देहातों में सड़कों का निर्माण कितनी तेजी से हुआ है। कई अन्य योजनाएं हैं इस सरकार की, जो बहुत सफल हुई हैं, लेकिन जिनका जिक्र बहुत कम होता है मीडिया में।

अगर सबसे बड़ा नुकसान मोदी को हुआ है तो यह कि उनकी छवि मुसलमानों में आज भी इतनी खराब है कि एक अजीब और खतरनाक किस्म का तनाव दिखता है उन बस्तियों में, जहां मुसलमान आबादी अधिक है। हाल में पूर्वी उत्तर प्रदेश की एक मस्जिद में जब मेरी बात हो रही थी कुछ समझदार बुजुर्ग मुसलमानों से, तो उन्होंने कहा कि मोदी दौर में उनको ऐसा लगने लगा है जैसे उन्हें दूसरे दर्जे का नागरिक बनाने की कोशिश हो रही है। मैंने जब उनको उन दंगों की याद दिलाई, जो हर साल हुआ करते थे उत्तर प्रदेश में और जिनमें हमेशा मुसलिम ज्यादा मरते थे, तो उन्होंने कहा कि वह दौर आज के दौर से फिर भी अच्छा था। मैंने पूछा कि कैसे, तो एक बुजुर्ग ने कहा, ‘दंगा होता था और खत्म हो जाता था। आज हाल यह है कि कुछ ऐसा हो रहा है कि मुसलमानों को ही नहीं, उनकी रोजी-रोटी तबाह करने की कोशिश हो रही हो।’उन्होंने यह भी कहा कि ‘सबका साथ, सबका विकास’ सिर्फ चुनावी जुमला मालूम होत है, क्योंकि जमीन पर हकीकत कुछ और है। इस गलतफहमी को सिर्फ प्रधानमंत्री दूर कर सकते हैं और इसे दूर करना इसलिए जरूरी है कि अभी तक भारत के ज्यादातर मुसलमान जिहादी आतंकवाद से दूर रहे हैं। जिहादी आतंकवाद का असर अगर भारत के मुसलमानों में फैलना शुरू हो जाए, तो वास्तव में नौबत आ सकती है भारत के दूसरे बंटवारे की।

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